*“समाज मर रहा है, पर करोड़ों की इमारतें बनानी हैं... आखिर किसके लिए?”* (कड़वे शब्द, पर सच्ची बात) …
*“समाज मर रहा है, पर करोड़ों की इमारतें बनानी हैं... आखिर किसके लिए?”*
(कड़वे शब्द, पर सच्ची बात)
*आज समाज के नाम पर करोड़ों की इमारतें बन रही हैं,*
भव्य भवन, संगठनों के ऑफिस, गेट, मूर्तियाँ,
पर क्या किसी ने एक पल को रुककर ये सोचा –
*“इन दीवारों के अंदर कौन रहेगा?”*
क्योंकि *समाज तो धीरे-धीरे मर रहा है।*
वो समाज, जिसने हमारे पुरखों को पहचान दी,
जिसने संस्कार, एकता और सहकार का पाठ पढ़ाया,
वही समाज आज सिर्फ़ *फोटो, गेट और फाउंडेशन स्टो* न तक सीमित हो गया है।
*नेतृत्व के नाम पर दिखावा, और सेवा के नाम पर सेल्फी!*
आज हमारे समाज के कुछ तथाकथित *“समाज के नेतृत्वकर्ता”*
समाज की जड़ों को मज़बूत करने की बजाय
*राजनीतिक चमक और दिखावे की दीवारें खड़ी कर रहे हैं।*
उनके लिए समाज मतलब *मंच, माला और मीडिया कवरेज।*
बस हर कार्यक्रम में “जय माता दी” बोलना और फोटो खिंचवाना ही सेवा बन गई है।
पर क्या यही “एकता” है?
क्या यही “पाटीदार गौरव” है?
क्या यही “संस्कारों की विरासत” है?
*5 से 10 साल बाद ये समाज रहेगा भी या नहीं?*
ज़रा सोचिए...
आज के युवा को अपने समाज के कार्यक्रम, संस्था या परंपरा से कोई मतलब नहीं।
वो जानता तक नहीं कि उसके समाज में कौन नेता है,
कौन संस्था क्या करती है।
क्योंकि हमने उसके लिए आकर्षण नहीं, दूरी बनाई है।
हमने उसे जोड़ा नहीं,
बल्कि हर निर्णय में “उसे बाहर” रखा।
आज जो मंचों पर बैठे हैं, वही भूल गए कि
कल ये मंच खाली रह जाएंगे —
क्योंकि नई पीढ़ी को इन मंचों से कोई लगाव ही नहीं बचा।
*आज एक और दर्दनाक सच्चाई सामने है —*
हमारे समाज के रिश्ते अब समाज के अंदर नहीं,
बल्कि “अन्य समाजों” में बनने लगे हैं।
क्यों? क्योंकि अपने समाज में अब अपनापन नहीं रहा।
जहाँ पहले “पाटीदार पाटीदार का सहारा” था,
आज वही पाटीदार एक-दूसरे से कट चुका है।
> “जब अपने समाज में सम्मान, जुड़ाव और संवाद नहीं बचते ,
> तो लोग बाहर अपनापन ढूँढने लगते हैं।”
और यही किसी समाज के अंत की शुरुआत होती है।
समझो — अगर आज यह प्रवृत्ति बढ़ती रही,
तो अगले 10 साल में हम “समाज” नहीं,
सिर्फ़ “नाम” बनकर रह जाएंगे।
*हमारी संस्कृति, सभ्यता और DNA – जिन पर हम गर्व करते हैं,*
वो धीरे-धीरे मिट रहे हैं।
हमारे पूर्वजों ने इस समाज की नींव “त्याग और सादगी” पर रखी थी,
हमने उसे “राजनीति और प्रतिस्पर्धा” से तोड़ दिया।
> “जहाँ पहले समाज एक परिवार था,
> आज वही समाज ठेकेदारों का व्यापार बन गया है।”
हमारे समाज में अब जो सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं,
वो ज़मीन पर नहीं,
बल्कि *बोर्ड पर – ट्रस्ट के नामों में हैं।*
*जमीन की सच्चाई देखनी है?*
तो किसी गाँव के साधारण पाटीदार परिवार में जाइए।
वहाँ देखिए – बेटा नौकरी के लिए बाहर है,
बेटी को समाज की संस्था से कोई सपोर्ट नहीं,
बुज़ुर्गों की बात सुनने वाला कोई नहीं।
माँ मंदिर जाती है, पर समाज में उसका कोई प्रतिनिधित्व नहीं।
वहीं शहरों में –
लोगों के पास लाखों रुपये हैं समाज भवन के लिए,
पर किसी ज़रूरतमंद छात्र की फ़ीस भरने के लिए
“फंड की कमी” बताई जाती है।
*कड़वी बात, पर सच्ची:*
> “हम इमारतें बना रहे हैं समाज की पहचान के लिए,
> पर पहचान तो उसी दिन मिट गई जब इंसानियत मर गई।”
*अब भी वक्त है – दिशा बदलो!*
✅ समाज के नाम पर सिर्फ़ दीवारें नहीं, दिल जोड़ो।
✅ अगली पीढ़ी को शामिल करो, न कि बाहर रखो।
✅ एकता का अर्थ “वोट बैंक” नहीं, “विचार बैंक” बनाओ।
✅ माला और फोटो से पहले कर्म को प्राथमिकता दो।
हमारा समाज तब जिंदा रहेगा,
जब हर व्यक्ति अपने अंदर ये सवाल पूछे —
*“मैं समाज के लिए क्या कर रहा हूँ?”*
> ना कि —
> “समाज मेरे लिए क्या कर रहा है?”
*संदेश:*
> “जो समाज अपने युवाओं को खो देता है,
> वह भविष्य नहीं, सिर्फ़ इतिहास बन जाता है।”
✍️ *प्रस्तुतकर्ता:*
*पाटीदार एकता मंच* /*पाटीदार शादी परिवार*
🌐 Ram Patidar (9399604709)
📍 *“हम इमारत नहीं, विचार खड़ा कर रहे हैं — एक संगठित, सजग और संस्कारित समाज।”*
*पाटीदार शादी परिवार के व्हाट्सप्प ग्रुप से जुड़ने के लिए लिंक का उपयोग करे।*
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