संत का मान, सम्मान, बहुमान और अपमान
एक व्यक्ति ने गुस्से में संत का अपमान कर दिया, अगले दिन वह माफी मांगने पहुंचा, संत ने उससे कहा, ‘नगर के बीच में पक्षियों के पंख रख आओ’
गुस्से में बोले गए शब्द दूसरों के दुख पहुंचाते हैं। गुस्से की वजह से हमारी सोचने-समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। इसी वजह से काफी लोग गुस्से में ऐसे शब्द बोल देते हैं, जिनके लिए बाद में पछतावा होता है। लेकिन, मुंह से बोले गए शब्द वापस नहीं आते हैं। इसीलिए बोलते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए। ये बात हम एक लोक कथा से समझ सकते हैं।
कथा के अनुसार पुराने समय में एक संत रोज अपने शिष्यों को और अन्य लोगों को उपदेश देते थे। गांव के अधिकतर लोग संत का बहुत सम्मान करते थे। लेकिन, कुछ ऐसे भी थे, जो संत को पसंद नहीं करते थे।
एक दिन संत से जलने वाला व्यक्ति उनके आश्रम में पहुंचा और सभी लोगों के सामने संत का अपमान करने लगा। लेकिन, संत ने उसे पलटकर कुछ भी नहीं कहा। जब वह व्यक्ति बोलते-बोलते थक गया तो चला गया। गांव के लोग ये देखकर बहुत दुखी थी। संत ने अपना प्रवचन फिर से शुरू कर दिया।
जब वह व्यक्ति अपने घर पहुंचा तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह अगले दिन संत के आश्रम पहुंचा और उनसे माफी मांगने लगा। संत ने उससे कहा कि एक काम करो आश्रम में पक्षियों के कई पंख बिखरे हुए हैं। उन्हें इकट्ठा करके यहां ले आओ। उस व्यक्ति ने तुरंत ये काम शुरू कर दिया। कुछ देर बाद वह पंख लेकर आ गया।
संत ने उससे कहा कि अब ये पंख अपने नगर के बीच में रख आओ। वह व्यक्ति संत की आज्ञा मानकर नगर के बीच में पहुंचा और सभी पंख रखकर संत के पास पहुंच गया। संत ने उससे फिर कहा कि अब एक और अंतिम काम कर दो। वे सारे पंख वापस लेकर आ जाओ।
जब वह व्यक्ति नगर के बीच में पहुंचा तो वहां रखे सभी पंख उड़कर इधर-उधर फैल गए थे। सभी पंखों को इकट्ठा कर पाना उसके लिए बहुत मुश्किल था। वह खाली हाथ ही संत के पास पहुंचा और पूरी बात बता दी।
संत ने उससे कहा कि भाई, ठीक इसी तरह जब हम गुस्से में होते हैं तो जो कुछ भी बोलते हैं, वह दूसरों को दुख देता है। जब हमारा मन शांत होता है, तब हमें गलती का अहसास होता है। लेकिन, तब हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जिस तरह सभी पंखों को इकट्ठा कर पाना संभव नहीं है। मुंह से निकले शब्द वापस नहीं लिए जा सकते हैं। इसीलिए गुस्से से बचना चाहिए और कुछ भी बोलते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए।